कृष्ण जी के मन्दिर में चोरी | Shri Krishna Story in hindi

Shri Krishna Story in hindi

Shri Krishna Story in hindi: एक गॉव में एक गरीब किसान का परिवार रहता था। माधव अपनी पत्नि साधिका के साथ खेती करता था। उनकी एक छोटी सी बेटी थी रचना। माधव भगवान कृष्ण का बहुत बड़ा भक्त था। एक दिन वह मन्दिर गया तो रचना भी उसके साथ चली गई।

मन्दिर से वापस आने के बाद रचना ने अपने पिता से कहा।

रचना: पिताजी मन्दिर जो मूर्ति थी उसने कितने अच्छे कपड़े पहने थे। हम तो हमेशा फटे पुराने कपड़े पहनते हैं।

माधव: बेटा वे तो भगवान कृष्ण और राधारानी की मूर्ति है। वहां मन्दिर में तो बड़े बड़े सेठ बहुत सा पैसा दान में देते हैं। जिससे भगवान की पोशाक बनाई जाती है।।

रचना: लेकिन पिताजी भगवान के पास किस चीज की कमी है। अगली बार मैं दुबारा आपके साथ मन्दिर चलूंगी और भगवान से हम सब के लिये अच्छे अच्छे कपड़े मांगूगी।

साधिका: अच्छा ठीक है मांग लेना अब बहुत देर हो गई है सो जा।

अगले दिन रचना अपनी मॉं के साथ राधा कृष्ण के मन्दिर पहुंच जाती है।

रचना: भगवान हमें भी अच्छे अच्छे सुन्दर कपड़े दो गहने दो खाने के लिये मिठाई और पकवान दो आप तो मजे से यह सब खाते हो लेकिन हमें कुछ नहीं मिलता।

साधिका: बेटा ऐसा नहीं कहते जो मिल रहा है उसमें खुश रहना चाहिये।

कुछ देर भगवान के सामने बैठ कर दोंनो मॉं बेटी घर वापस आ जाती हैं।

इसी तरह कुछ दिन और बीत जाते हैं। इसी बीच एक सेठ जी मन्दिर में आते हैं।

सेठ जी: पंडित जी मैं भगवान कृष्ण के श्रंगार के लिये यह रेशमी पटका और राधा जी के लिये यह रेशमी चुनरी लाया हूं साथ में सोने के गहने भी हैं। आप इनका श्रृंगार कर दीजिये। लेकिन ध्यान रहे इसकी रखवाली करना आपकी जिम्मेदारी है।

पंडित जी कृष्ण जी और राधा जी के वस्त्र बदल कर नये रेशमी वस्त्र व गहने पहना देते हैं।

कुछ देर बाद सेठ जी वापस चले जाते हैं। और पुजारी जी पूजा करने में व्यस्त हो जाते हैं। इसी बीच साधिका और रचना दोंनो मन्दिर पहुंचते हैं।

रचना: मॉं देखो कान्हा जी और राधा जी ने कितनी सुन्दर पोशाक पहनी है। यह मुझे भी पहननी है आप इनसे कहिये कि यह पोशाक कुछ देर के लिये हमें दे दे।

साधिका: बेटा ऐसा नहीं बोलते भगवान नाराज हो जायेंगे।

रचना: मॉं मुझे तो यही पोशाक चाहिये राधा जी की चुनरी कितनी अच्छी लग रही है।

पंडित जी: तुम दोंनो यहां बैठ कर क्या बातें कर रही हों कहीं गहने और कपड़े चुराने की मंशा तो नहीं बना रही।

साधिका: नहीं पंडित जी बच्ची है इसलिये जिद कर रही है। हम तो मन्दिर में हर दिन पूजा करने आते हैं।

पंडित जी: चलो भागो यहां से मैं सब समझता हूं सेठ जी ने सारी जिम्मेदरी मुझे दी है। गहनो की रखवाली की।

यह कहकर पंडित मॉं बेटी को मन्दिर से निकाल देता है। शाम को जब माधव घर वापस आता है तो साधिका उसे सारी बात बताती है।

माधव: तू चिन्ता मत कर मैं कल जाकर पंडित जी से बात करूंगा।

अगले दिन माधव साधिका और रचना तीनों मन्दिर पहुंच गये। वहां सेठ जी भी पूजा करने आये थे।

साधिका और रचना को देख कर पंडित ने सेठ जी से कहा

पंडित: सेठ जी ये वही लोग हैं जो मन्दिर में चोरी करने की योजना बना रहे थे।

सेठ जी: सुन बे माधव आज के बाद तू या तेरा परिवार इस मन्दिर के आस पास भी दिखाई दिया तो तुझे गॉव से बाहर निकलवा दूंगा।

माधव अपने परिवार के साथ घर वापस आ जाता है। साधिका रोने लगती है।

साधिका: भगवान क्या सिर्फ अमीरों के हैं हम गरीबों के लिये तो मन्दिर भी बंद हो गये।

रचना: तुम चिन्ता मत करो मॉं मैं अब कभी नये कपड़े नहीं मागूंगी।

तीनों बिना खाना खाये सो जाते हैं।

अगले दिन माधव खेत पर जाने के लिये तैयार हो रहा था तभी उसे एक आदमी बुलाने आया।

माधव अपने परिवार के साथ मन्दिर पहुंचा तो उसे पंडित जी ने बताया कि राधा कृष्ण जी की रेशमी पोशाक काली पड़ गयी उसे हटा कर दूसरी पोशाक पहनाई वह भी काली पड़ गई। हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई लगता है भगवान नाराज हो गये।

तभी रचना मन्दिर के अंदर चली गई

रचना: भगवान जी मुझे माफ कर दीजिये मेरे कारण आप नाराज मत होईये मैं अब कभी आपकी पोशाक नहीं मागूंगी।

तभी राधा जी की चुनरी रचना के उपर आ गई और वह रेशम की बन गई। यह देखकर सेठ जी ने कहा।

सेठ जी: कान्हा जी हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई हमने आपकी नन्ही भक्त का अपमान किया।

उसके बाद राधा कृष्ण जी के कपड़े और आभूषण पहले के जैसे हो गये।

सेठ जी: माधव आज से तुम्हारे परिवार का पूरा ध्यान मैं रखूंगा और इस बच्ची के लिये कपड़े गहने और खाने पीने का सारा सामान मेरे घर से आयेगा।

यह सुनकर माधव और साधिका बहुत खुश हुए

साधिका: कान्हा जी ने स्वयं अपने वस्त्र हमें देकर हमारा जीवन धन्य कर दिया।

उस दिन से रचना और उसका परिवार को पूरे गॉव में मान सम्मान मिलने लगा।