सास के सलीके | Sas Bahu ki Kahani in Hindi

Sas Bahu ki Kahani in Hindi

Sas Bahu ki Kahani in Hindi : श्वेता अभी सोफे पर बैठे किसी ख्याल में खोई हुई थी। तभी कविता ने उसे पुकारा

कविता: भाभी जी कहां खो गईं मैंने घर की सारी सफाई कर दी है। आप कहें तो आपके लिये चाय बना दूं।

श्वेता: हॉं बढ़िया सी चाय बना दे और अपने लिये भी बना लेना।

कुछ ही देर में कविता चाय बना कर श्वेता के पास आकर बैठ जाती है।

कविता: भाभी जी क्या सोच रही हैं आप आज बहुत उदास दिखाई दे रहीं हैं।

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श्वेता: कविता कभी कभी किसी इन्सान की अहमियत उसके बाद समझ में आती है। मांजी को गये अभी दो महीने हुए हैं। उनके सामने मैं कितनी बेफिक्र थी।

कविता: लेकिन भाभी आपकी सास तो हमेशा आपको डॉटती रहती थीं।

श्वेता: बस यही बात तो आज उदास कर देती है। आज न कोई डाटने वाला है न कोई रोकने टोकने वाला। लेकिन अन्दर कितना सूनापन है। यह तू नहीं समझेगी।

श्वेता ने अपनी सास के अंतिम समय में उनके पास बैठ कर बिताये पलों को याद करते हुए कहा –

श्वेता: तुझे पता है उन आखिरी पलों में मांजी ने मुझसे क्या कहा – उन्होंने अपनी परवाह न करते हुए मुझे अपना सब कुछ सोंपते हुए कहा बेटी ये सब अब तुझे सम्हालना है। और हॉं अब मैं नहीं रहूंगी टोकने के लिये घर को संभाल कर चलाना।

श्वेता ने आगे कहा –

श्वेता: यह सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सर से छत हट गई है और में अब यह सब कैसे संभालूंगी। उस दिन से आज तक सब कुछ संभालने की कोशिश करती हूं लेकिन कुछ न कुछ छूट जाता है।

यह कहकर श्वेता रोने लगी।

कविता: भाभी अब तो सब कुछ आपको ही संभालना है। हिम्मत से काम लो।

श्वेता: सुन तू घर का काम निबटा ले मैं कुछ देर में आती हूं।

श्वेता घर से निकल कर ऑटो लेकर सीधा बैंक पहुंच जाती है। बैंक पहुंच कर वह लॉकर खोलने पहुंच जाती है। वहां पहुंच कर वह अपनी सारी ज्वैलरी को छू कर देखती है।

जो उसे उसके पिता ने दी थीं और जो अंतिम समय में उसकी सास ने दी थीं।

श्वेता उन्हें छू कर अपनी सास को पाने का अहसास करती है। जिस ज्वैलरी को एक बार पहनने के लिये अपनी सास से वह बार बार तकरार करती थी।

आज वह हमेशा के लिये उसके पास है लेकिन उसे वह ज्वैलरी फीकी लग रही है।

अभी पिछले साल ही की बात है। श्वेता ने अपनी पति सचिन से कहा था –

श्वेता: सुनो आप मांजी से बात करो उनकी ज्वैलरी को सुनार को देकर मेरे लिये नये फेशन का सोने का सेट बनवा दीजिये।

सचिन: श्वेता तुम्हें पता है मांजी नहीं मानेंगी वह हमारी पुस्तेनी ज्वैलरी है। तुम कुछ दिन रुक जाओ मैं तुम्हें अलग से एक सेट बनवा दूंगा।

आज का दिन है श्वेता के सामने लॉकर में वही पुस्तेनी सेट पड़ा था। लेकिन उसे देकर नया सेट बनवाने के ख्याल से ही वह कांप जाती है।

उसे लगा जैसे उसमें उसकी सास का आशीर्वाद शामिल है और अंतिम समय में कहे उनके शब्द ‘‘बेटी अब ये सब तुझे ही संभालना है’’।

इन सब बातों को सोच कर उसकी आंखों में आंसू छलक गये। उसने एक बार सभी जेवरों पर हाथ फेरा जैसे उसके बहाने अपनी सास का आशीर्वाद पाना चाह रही थी। उसके बाद लॉकर बंद करके घर आ गई।

शाम को सचिन जी घर आये तो श्वेता ने उन्हें सारी बात बताई।

यह सुनकर सचिन जी ने कहा –

सचिन: सुनों तुम्हें क्या लगता है मॉं इस घर से चली गईं हैं। नहीं वे अपना एक अंश तुम्हारे दिल में छोड़ गईं हैं।

अब तुम कोई भी फैसला इस घर के लिये लोंगी तो तुम्हारे दिल में बैठी मेरी मॉं तुम्हें गलत फैंसला लेने से रोकेंगी।

बुर्जुग ऐसे ही होते हैं। जब तक रहते हैं। हमें जिन्दगी जीने के सही सलीके सिखाते रहते हैं। उनके न रहने पर वही सलीके सीखने के लिये जिन्दगी भर ठोकरें खानी पड़ती हैं।

अगले दिन से श्वेता के काम करने का ढंग सोचने का ढंग बिल्कुल बदल गया था। एक अलग सा बड़प्पन उसके अंदर दिखने लगा था।

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Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.