सागर ऑफिस नहीं जाकर उसी कैफे में जाकर बैठ गया जहां वह अक्सर शालिनी के साथ जाता था। उसने एक कॉफी ऑडर की।
कॉफी पीते पीते उसके दिमाग में अलग अलग ख्याल आ रहे थे, पापा की बीमारी के बारे में सोचता फिर उसे चिंता होती की शालिनी फोन क्यों नहीं उठा रही। अपना आज और अपना भविष्य उसे सब कुछ धुंधला नजर आ रहा था।
इधर शालिनी अपनें कमरे में बैठी थी। तभी उसके पापा कमरे में आये।
शालिनी की आंखें सूज रही थीं।
हिम्मतलाल जी: बेटा क्या बात है पूरी रात रोती रही क्या।
शालिनी: नहीं पापा बस ऐसे ही।
हिम्मतलाल जी: मैं सुबह से देख रहा हूं कई बार तेरा फोन रिंग हुआ और तूने उठाया नहीं कहीं सागर का फोन तो नहीं था।
शालिनी (थोड़ा असहज होते हुए) : जी पापा लेकिन मेरा मूड नहीं है उससे बात करने का।
हिम्मतलाल जी: लगता है तूने अपनी मॉं की बातों को मन से लगा लिया है। मैं यह नहीं कहता कि तेरी मॉं गलत कह रही है। तुझे उससे शादी करनी चाहिये या नहीं ये तेरा फैंसला है।
लेकिन एक गलती जो इस समय तू सबसे बड़ी कर रही है। वह यह कि उसे इस समय तेरी जरूरत है। इतने पुराने रिश्ते को एक पल में नहीं छोड़ा जाता, वो भी उस समय जब उसे तेरी सबसे ज्यादा जरूरत है।
घर में वो किसी से बात नहीं कर सकता। अपने दोस्तों से वह कम ही मिलता है। ऐसे मैं अकेली तू ही है जिसे वह अपना समझ कर फोन कर रहा है। उसे इस समय किसी सहारे की जरूरत है। जो वो तुझमें ढूंढ रहा है।
शालिनी: लेकिन पापा मेरी भी तो जिन्दगी है। मुझे भी तो अपने भविष्य के बारे में सोचना है।
हिम्मतलाल जी: बेटा यदि तू उसके साथ अपना भविष्य नहीं देखती तो कोई बात नहीं। लेकिन एक दोस्त की तरह उसकी परेशानी में उसका साथ तो दे सकती है।
शालिनी को अपनी गलती का अहसास होता है। वह तुरन्त सागर को फोन करती है।
शालिनी: सागर क्या बात है सब ठीक है न।
सागर: कहां हो यार शालिनी सुबह से कितने फोन किये तुम्हें।
शालिनी: वो कुछ जरूरी काम था। बताओ क्या काम है।
सागर: उसी कैफे में बैठा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। आज ऑफिस जाने का बिल्कुल मन नहीं था। क्या तुम एक बार मिलने आ सकती हों।
शालिनी: ठीक है मैं बीस मिनट में पहुंचती हूॅं।
शालिनी का जबाब सुनकर हिम्मतलाल जी मुस्कुराते हैं और कमरे से बाहर निकल जाते हैं।
कुछ देर बाद सागर और शालिनी मिलते हैं।
शालिनी: सागर क्या बात है इतना परेशान क्यों हो?
सागर: शालिनी मैं बहुत टूट चुका हूं। पापा का चेहरा मुझ से देखा नहीं जाता। आज पता लगा यदि पता हो कोई अपना साथ छोड़ कर जाने वाला है तो कैसा महसूस होता है।
यह सुनकर शालिनी को धक्का लगा वे सोचने लगी। इस समय वह भी तो यही करने जा रही थी। अगर पापा उसे नहीं समझाते तो वह भी तो सागर का साथ छोड़ कर जा रही थी। ऐसे में उस पर क्या बीतती।
शालिनी: सागर इतना मत सोचो सब कुछ भगवान पर छोड़ दो ये समय टूटने का नहीं है। अपने परिवार के साथ ढाल बन कर खड़े रहने का है। अब सब कुछ तुम्हें ही सम्हालना है। तुम टूट जाओगे तो तुम्हारे परिवार का क्या होगा।
और मैं भी तो तुम्हारे साथ हूं इस मुश्किल समय को हम दोंनों मिल कर निकल लेंगे।
सागर: बस तुम मेरे साथ हो तो मैं हर मुश्किल का सामना कर लूंगा।
शालिनी सागर की हिम्मत तो बढ़ा रही थी। लेकिन साथ साथ उसे अपना भविष्य भी अंधकार में दिख रहा था। जिस सागर से उसने प्यार किया था। वह एक जिंदा दिल इंसान था।
लेकिन जिस सागर से वह आज मिल रही है, वह एक हारा हुआ इंसान है जो उसके भरोसे सब कुछ छोड़ कर बैठा है।
शालिनी पूरे दिन सागर के साथ रही। सागर को ढंढासा बंधाती रही उसकी हिम्मत बढ़ाती रही लेकिन उसने देखा कि सागर बिल्कुल टूट चुका है। यह देख कर उसकी हिम्मत भी टूटने लगी।
एक तरफ अपनी मॉं की बातें और एक तरफ अपने पिता की बातें दोंनो में तालमेल बैठाने की कोशिश करती लेकिन सागर की बातें सुनकर मॉं का पक्ष भारी लगता।
इसी तरह पूरा दिन बीत गया। शाम को शालिनी को घर छोड़ कर सागर अपने घर आ गया।
Image by Niek Verlaan from Pixabay
















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