रिश्तों की डोर – भाग 2

Rishton ki Dor - Bhag 2

डॉक्टर: सागर तुम्हारे पापा की रिर्पोट आ गई है।

सागर: डॉक्टर साहब सब ठीक तो है न, कोई चिन्ता की बात तो नहीं है।

डॉक्टर: सागर तुम्हें हिम्मत से काम लेना होगा। तुम्हारे पिता को केंसर है। वो भी तीसरी स्टेज पर हैं।

सागर के पैरों तले जमीन खिसक गई …. उसकी आंखों से आंसू बहने लगे …. डॉक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे पीने के लिये पानी दिया।

डॉक्टर: सागर तुम यह बात अपने पिता को नहीं बताना उनका हार्ट पहले ही कमजोर है।

सागर: डॉक्टर साब अब तो सांइस ने काफी तरक्की कर ली है आप बढ़िया से बढ़िया इलाज शुरू कीजिये पैसों की चिंता मत कीजिये मैं इंतजाम कर लूंगा।

डॉक्टर: सागर बात पैसों की नहीं है। कैंसर काफी फैल चुका है। उनके पास ज्यादा से ज्यादा छहः महीने का टाईम हैं। मैं कुछ दवाईंया लिख रहा हूं इससे उन्हें कुछ आराम मिलेगा। लेकिन जितना हो सके उन्हें खुश रखने की कोशिश करना।

सागर अंदर से टूट जाता है। वह बाहर निकल कर शालिनी को फोन करता है। दोंनो शाम को मिलते हैं। सागर शालिनी को सारी बात बताता है और रोने लगता है।

शालिनी: सागर तुम हिम्मत से काम लो सब ठीक हो जायेगा।

सागर: तुम्हें पता है शालिनी। मेरे पापा ने कितने कष्ट उठा कर मुझे पढ़ाया लिखाया अब जब उन्हें सुख से रहने का समय आया तो ये बीमारी खड़ी हो गई।

शालिनी: भाग्य के लिखे को कोई नहीं बदल सकता अब तुम केवल उनकी खुशी के बारे में सोचो उन्हें खुश रखो और खुद भी हिम्मत रखो।

इसी तरह बातें करके सागर घर आ गया।

घर आते ही पापा ने पूछा

प्रशांत जी: बेटा क्या हुआ रिपोर्ट लेने गये थे।

सागर: पापा सारी रिर्पोट र्नामल हैं कोई चिंता की बात नहीं है। बस कुछ बीपी बढ़ा हुआ है डॉक्टर ने कुछ मेडिसन लिख दी हैं। आप लेते रहियेगा।

यह कहकर सागर चुपचाप अपने कमरे में चला गया। उसके पीछे पीछे मॉं चली आई

पुष्पा जी: बेटा क्या बात है तू कुछ परेशान है। सब ठीक तो है न

सागर: हॉं मॉं सब ठीक है आप चिन्ता न करें।

पुष्पा जी: चल तो फ्रेश हो जा मैं तेरे लिये खाना लगा देती हूं।

सागर: नहीं मॉं वो शालिनी से मिल कर आ रहा हूं वहीं हमने खाना खा लिया था। आप और पापा खाना खा लो और सो जाओ। मैं भी सोने जा रहा हूॅं।

उनके जाने के बाद सागर कमरा बंद करके बहुत देर तक रोता रहता है।

अगले दिन वह घर से ऑफिस जाने के लिये निकला लेकिन आज उसका ऑफिस जाने का बिल्कुल मन नहीं था।

इधर एक दिन पहले जब शालिनी घर पहुंची तो उसका मन काफी उखड़ा हुआ था। घर पहुंचते ही उसने देखा उसके पिता हिम्मत लाल जी सोफे पर बैठे थे। शालिनी की मॉं सुशीला किचन में खाना बना रहीं थीं।

हिम्मत लाल जी ने पूछा

हिम्मतलाल जी: बेटी क्या बात है बहुत परेशान है।

उनके पूछने पर शालिनी ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर हिम्मतलाल जी ने कहा –

हिम्मतलाल जी: यह तो बहुत बुरा हुआ। बहुत ही सज्जन हैं सागर के पिता।

कुछ देर चुप बैठने के बाद उन्होंने आगे कहना शुरू किया –

हिम्मतलाल जी: बेटी इस समय तुम्हें सागर का साथ देना चाहिये वह बहुत तनाव में होगा।

तभी सुशीला जी किचन में से बाहर आ गईं।

सुशीला जी: आप बाप बेटी भी कमाल करते हो कभी अपने बारे में भी सोचोगे या हमेशा दूसरों के बारे में ही सोचते रहोगे।

उन्होंने आगे कहना शुरू किया –

सागर और तुम पिछले तीन साल से शादी की बात कर रहे हो। हर बार तुम ही उसके लिये कुर्बानी देती रहो पहले उसकी नौकरी नहीं थी।

जब नौकरी लगी तो यह कह कर शादी के लिये मना कर दिया कि बहन की शादी करनी है।

उसके बाद भी हम इंतजार करते रहे। कल तक कह रहा था बहन की शादी को एक साल पूरा होते ही हम शादी कर लेंगे। लेकिन अब तो हद हो गई अब पिताजी की बीमारी बोल कर शादी को टाल रहा है। मुझे तो उसकी किसी बात पर विश्वास नहीं है कहीं तुम्हें बेवकूफ तो नहीं बना रहा।

मॉं ….. शालिनी लगभग चीखते हुए बोली।

शालिनी: मॉं तुम कैसी बातें कर रही हों।

सुशीला जी: ठीक कह रही हूं बेटा अगर तेरी जगह वो होता तो कब का किसी ओर से शादी कर लेता। क्या कुर्बानी सिर्फ औरतों के हिस्से में आती है।

शालिनी बिना कुछ बोले उठ कर अपने कमरे में चली गई।

उसे माँ पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह कुछ देर तक बिस्तर पर पड़े पड़े रोती रही। फिर उसने उठ कर मुंह धोया। फिर वह मॉं की बातों के बारे में सोचने लगी लेकिन इस बार उसे गुस्सा नहीं आया और कहीं न कहीं मॉं की बातें ठीक लगने लगी।

आखिर चार साल बहुत लम्बा समय होता है।

अगले दिन जब वह सुबह सोकर उठी तो मन बहुत उदास था। असमंजस की स्थिती थी कि ऐसे में सागर का साथ दे या अपने भविष्य के बारे में सोचे वह फैसला नहीं ले पा रही थी।

इसी कश्माकश के बीच सागर का फोन आ गया।

शालिनी बहुत कन्फयूज हो रही थी इसलिये उसने फोन नहीं उठाया।

इधर सागर फोन किये जा रहा था। लेकिन शालिनी फोन नहीं उठा रही थी।

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Photo by Timur Weber

Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.