Ananta Chaturdashi Vrat Katha : भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनन्त चतुर्दशी का व्रत किया जाता है। इस दिन अनन्त भगवान् की पूजा की जाती है और अलोना व्रत रखा जाता है।
इस व्रत को प्रायः हिन्दूधर्म की सभी स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा तथा घर-परिवार की सुख-शान्ति के लिए किया करती हैं।
अनन्त चतुर्दशी व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करने से खोई हुई सम्पति, राज्य तथा अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इसलिए इस व्रत को सामान्य परिवार की स्त्रियों से लेकर राजा महाराजा घराने तक की स्त्रियाँ बड़े ही उत्सवपूर्वक किया करती हैं।
जो मनुष्य अपने घर की सुख-शान्ति, समृद्धि तथा स्वर्ग की प्राप्ति की मनोकामना करते हैं, उसे यह व्रत अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
अनन्त चतुर्दशी पूजा विधि (Ananta Chaturdashi Puja Vidhi)
भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को नित्यकर्म एवं स्नानादि से निवृत्त होकर अनन्त चतुदर्शी व्रत का संकल्प धारण करें। अक्षत, दूर्वा और शुद्ध सूत से 14 गाँठों से बने हल्दी से रंगे हुए अनन्त का पूजन करें।
पूजन के बाद घृत का संक्षिप्त हवन करें तथा ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करें। बाद में धागे को अपनी बाहों में बाँध लें। इस धागे को स्त्री बांये हाथ में तथा पुरुष दाहिने हाथ में बाँधे।
अनन्तर भगवान् की कथा सुने और सभी श्रोताओं को प्रसाद तथा पूआ बाँट दें।
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यह व्रत चौदह वर्षोंतक लगातार करना चाहिए। जब चौदहवर्ष पूर्ण हो जाय तब एक मंडप बनाकर उसमें ताम्बे का कलश स्थापित करें।
उसे रेशमी पीले कपड़े से ढँक दें। फिर उस पर अनन्त भगवान् की मूर्ति रखें और षोडशोपचार विधि से पूजन करें। अनन्तर भगवान् के अलावा गणेशजी, लोकपाल आदि की भी पूजा करें, हवन करावें और चौदह ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दें।
भगवान् अनन्त की मूर्ति को आचार्य या वेदपाठी विद्वान पुरुष को दान कर दें। फिर स्वयं अल्पाहार या फलाहारकर व्रत तोड़ें।
इस प्रकार जो इस व्रत को विधिपूर्वक करते हैं। उसे सुख-शान्ति और अन्त में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (Ananta Chaturdashi Vrat Katha)
द्वापर काल में जब युधिष्ठिर अपने भाइयों तथा पत्नी के साथ 12 वर्षों का वनवास भोग रहा था। उसी समय एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण का पदार्पण उनकी आश्रम में हुआ।
वार्तालाप के बीच युधिष्ठिर ने भगवान् से अपनी इन विपतियों से छुटकारा पाने का जब उपाय पूछा, तब भगवान् ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी व्रत करने का उपदेश दिया।
इस व्रत का महात्म्य बताते हुए उन्होंने यह कथा सुनाईµ
सत्युग में सुमन्तु नामका एक ब्राह्मण था। उसकी सुशीला नामकी एक पत्नी थी। सुमन्तु की पहली पत्नी का जब देहान्त हो गया, तो उसने अपना दूसरा विवाह कर लिया।
पहली पत्नी से लीला नाम की एक कन्या थी। दुर्भाग्यवश लीला की उसकी विमाता से नहीं पटती थी, क्योंकि वह अत्यन्त ईष्यालु थी। लीला भगवान् में भक्ति रखती थी।
जब बड़ी हुई तो उसका विवाह कौंडिन्य नामक एक योग्य ब्राह्मण से हुआ। विदाई के समय विमाता ने लीला को कुछ ही सामग्री दी थी।
जब वह पति के साथ ससुराल जा रही थी, तब उसने एक नदी के तट पर कुछ स्त्रियों को अनन्त चतुर्दशी का व्रत करते हुए देखा।
उन स्त्रियों से व्रत का विधि-विधान पूछकर उसने भी इसका विधिवत् अनुष्ठान किया। भगवान् की कृपा से थोड़े ही दिनों में लीला का घर धन-धान्य से भर गया।
लीला अनन्त के उस धागे को अपनी भुजा में छिपा कर रखती थी। संयोगात् एक दिन कौंडिन्य ने पत्नी की भुजा में उस साधारण से धागे को बंधा देखकर कहा,- ‘यह सूत तुम्हारे सुन्दर शरीर में मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता।’
लीला जबतक पति को समझा पाती कि कौंडिन्य ने सूत को खींचकर जलती हुई आग में डाल दिया। इस अविवेकपूर्ण कुकर्म के परिणामस्वरूप कौंडिन्य का सम्पूर्ण ऐश्वर्य शीघ्र ही न जाने कहाँ विलुप्त हो गया।
उसने अपने हृदय में यह मान लिया कि उसी के कुकर्म से उसकी यह दशा हुई है। तदन्तर उसने अनन्त भगवान् को ढूँढ़कर प्रसन्न करने के लिए वन मार्ग का अनुशरण किया।
मार्ग में कौंडिन्य से जो भी मिल जाता, उनसब से अनन्त भगवान् का पता पूछता, किन्तु कोई भी उसे नहीं बता सका। कौंडिन्य उदास हो गया और एक निर्जन वन में बैठ गया।
वहीं पर एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में साक्षात् विष्णु ने उसे दर्शन दिया। कौंडिन्य ने बड़े ही भक्ति और आतुरता से भगवान् की प्रार्थना की और अपने अपराध को क्षमा करने की विनती की।
भगवान् प्रसन्न हुए और उन्होंने अनन्त चतुर्दशी व्रत का विधिवत् पालन करने की सलाह दी। कौंडिन्य अनन्त चतुर्दशी व्रत का विधिवत् पालन करके पूर्ववत् सुख-शान्ति प्राप्त किया।
तभी से यह व्रत बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण के यह कथा सुनाने पर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने भी अपने भाइयों के साथ विधि पूर्वक भगवान् अनन्त का व्रत रखा और इनके पुण्य प्रभाव से अपने समस्त कष्टों से छुटकारा प्राप्त किया। अनन्तर सभी प्रकार के राज्य सुख-शान्ति का भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को चले गये।


















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